Saturday, 19 December 2015

Naujawan Bharat Sabha- Pillar of Secularism

An Extract from
Manifesto of Naujawan Bharat Sabha(NBS)-

"We Indians, what we are we doing? A branch of peepal tree is cut & religious feelings of the Hindus are injured. A corner of paper idol, tazia, of the idol-breaker Mohammedans is broken, & Allah gets enraged, who cannot be satisfied with anything less than the blood of the infidel Hindus. Man ought to be attached more importance than the animals and, yet here in India, they break each other's heads in the name of 'sacred  animals'.

It was written & published by Bhagwati Charan Vohra in 1926, man in 1st pic & NBS was formed by diehard efforts of Bhagat Singh along with Sukhdev & Comrade Ram Chander in 2nd pic. NBS was an open organization of Hindustan Socialist Republican Association(HSRA).These lines are so much relevant in today's conditions of our nation.

Inquilab Zindabad!
Saamrajyavaad ka naash ho!

Long Live Revolution!
Down with Imperialism!

Thursday, 5 November 2015

Truth of RSS- India's Pseudo- Nationalists

आर.एस.एस., यानी कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ खुद को एक सांस्कृतिक संगठन व “सच्चे देशभक्तों” का संगठन बताता है। उसका दावा है कि उसकी विचारधारा हिन्दुत्व और “राष्ट्रवाद” है। उनके राष्ट्र की परिभाषा क्या है यह आर.एस.एस. की शाखाओं में प्रचलित “प्रार्थना” और “प्रतिज्ञा” से साफ़ हो जाता है। अपनी “प्रार्थना” और “प्रतिज्ञा” में संघी हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति और हिन्दू समाज की रक्षा की बात करते हैं। स्पष्ट है कि धर्मनिरपेक्षता और जनवाद में इनका कोई यक़ीन नहीं है। हिन्दू समाज की भी संघियों की अपनी अपनी परिभाषा है। हिन्दुओं से इनका मतलब मुख्य और मूल रूप से उच्च जाति के हिन्दू पुरुष हैं। संघी ‘मनुस्मृति’ को भारत के संविधान के रूप में लागू करना चाहते थे। वही ‘मनुस्मृति’ जिसके अनुसार एक इंसान की जाति ही तय करती है कि समाज में उसका स्थान क्या होगा और जो इस बात की हिमायती है कि पशु, शूद्र और नारी सभी ताड़न के अधिकारी हैं। आर.एस.एस. का ढाँचा लम्बे समय तक सिर्फ़ पुरुषों के लिए ही खुला था। संघ के “हिन्दू राष्ट्र” की सदस्यता उच्च वर्ण के हिन्दू पुरुषों के लिए ही खुली है; बाकियों को दोयम दर्जे की स्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए; यानी, कि मुसलमानों, ईसाइयों, दलितों, स्त्रियों आदि को। संघ के तमाम कुकृत्यों पर चर्चा करना यहाँ हमारा मक़सद नहीं है क्योंकि उसके लिए तो एक वृहत् ग्रन्थ लिखने की ज़रूरत पड़ जायेगी। हमारा मक़सद है उन सभी कुकृत्यों के पीछे काम करने वाली विचारधारा और राजनीति का एक संक्षिप्त विवेचन करना।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा क्या है? अगर संघ के सबसे लोकप्रिय सरसंघचालक गोलवलकर और संस्थापक हेडगेवार के प्रेरणा-स्रोतों में से एक मुंजे की जुबानी सुनें तो संघ की विचारधारा स्पष्ट तौर पर फ़ासीवाद है। गोलवलकर ने अपनी पुस्तकों ‘वी ऑर अवर नेशनहुड डिफाइण्ड’ और ‘बंच ऑफ थॉट्स’ में स्पष्ट शब्दों में इटली के फासीवाद और जर्मनी के नात्सीवाद की हिमायत की। हिटलर ने यहूदियों के सफाये के तौर पर जो ‘अन्तिम समाधान’ पेश किया, गोलवलकर ने उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है और लिखा है कि हिन्दुस्तान में भी हिन्दू जाति की शुद्धता की हिफ़ाज़त के लिए इसी प्रकार का ‘अन्तिम समाधान’ करना होगा। संघ का सांगठनिक ढांचा भी मुसोलिनी और हिटलर की पार्टी से हूबहू मेल खाता है। इटली का फ़ासीवादी नेता मुसोलिनी जनतंत्र का कट्टर विरोधी था और तानाशाही में आस्था रखता था। मुसोलिनी के मुताबिक “एक व्यक्ति की सरकार एक राष्ट्र के लिए किसी जनतंत्र के मुकाबले ज़्यादा असरदार होती है।” फ़ासीवादी पार्टी में ‘ड्यूस’ के नाम पर शपथ ली जाती थी, जबकि हिटलर की नात्सी पार्टी में ‘फ़्यूहरर’ के नाम पर। संघ का ‘एक चालक अनुवर्तित्व’ जिसके अन्तर्गत हर सदस्य सरसंघचालक के प्रति पूर्ण कर्मठता और आदरभाव से हर आज्ञा का पालन करने की शपथ लेता है, उसी तानाशाही का प्रतिबिम्बन है जो संघियों ने अपने जर्मन और इतावली पिताओं से सीखी है। संघ ‘कमाण्ड स्ट्रक्चर’ यानी कि एक केन्द्रीय कार्यकारी मण्डल, जिसे स्वयं सरसंघचालक चुनता है, के ज़रिये काम करता है, जिसमें जनवाद की कोई गुंजाइश नहीं है। यही विचारधारा है जिसके अधीन गोलवलकर (जो संघ के सबसे पूजनीय सरसंघचालक थे) ने 1961 में राष्ट्रीय एकता परिषद् के प्रथम अधिवेशन को भेजे अपने सन्देश में भारत में संघीय ढाँचे (फेडरल स्ट्रक्चर) को समाप्त कर एकात्म शासन प्रणाली को लागू करने का आह्वान किया था। संघ मज़दूरों पर पूर्ण तानाशाही की विचारधारा में यक़ीन रखता है और हर प्रकार के मज़दूर असन्तोष के प्रति उसका नज़रिया दमन का होता है। यह अनायास नहीं है कि इटली और जर्मनी की ही तरह नरेन्द्र मोदी ने गुजरात में मज़दूरों पर नंगे किस्म की तानाशाही लागू कर रखी है। अभी हड़ताल करने पर कानूनी प्रतिबन्ध तो नहीं है, लेकिन अनौपचारिक तौर पर प्रतिबन्ध जैसी ही स्थिति है; श्रम विभाग को लगभग समाप्त कर दिया गया है, और मोदी खुद बोलता है कि गुजरात में उसे श्रम विभाग की आवश्यकता नहीं है! ज़ाहिर है-मज़दूरों के लिए लाठियों-बन्दूकों से लैस पुलिस और सशस्त्र बल तो हैं ही! जर्मनी और इटली में भी इन्होंने पूँजीपति वर्ग की तानाशाही को सबसे बर्बर और नग्न रूप में लागू किया था और यहाँ भी उनकी तैयारी ऐसी ही है। जर्मनी और इटली की ही तरह औरतों को अनुशासित करके रखने, उनकी हर प्रकार की स्वतन्त्रता को समाप्त कर उन्हें चूल्हे-चौखट और बच्चों को पैदा करने और पालने-पोसने तक सीमित कर देने के लिए संघ के अनुषंगी संगठन तब भी तत्पर रहते हैं, जब भाजपा शासन में नहीं होती। श्रीराम सेने, बजरंग दल, विश्व हिन्दू परिषद् के गुण्डे लड़कियों के प्रेम करने, अपना जीवन साथी अपनी इच्छा से चुनने, यहाँ तक कि जींस पहनने और मोबाइल इस्तेमाल करने तक पर पाबन्दी लगाने की बात करते हैं। यह बात अलग है कि यही सलाह वे कभी सुषमा स्वराज, वसुन्धरा राजे, उमा भारती, या मीनाक्षी लेखी को नहीं देते जो कि औरतों को गुलाम बनाकर रखने के मिशन में उनके साथ खड़ी औरतें हैं! गोलवलकर ने स्वयं औरतों के बारे में ऐसे विचार व्यक्त किये हैं। उनके विचारों पर अमल हो तो औरतों का कार्य “वीर हिन्दू पुरुषों” को पैदा करना होना चाहिए!

जहाँ तक बात इनके “राष्ट्रवादी” होने की है, तो भारतीय स्वतन्त्र संग्राम के इतिहास पर नज़र डालते ही समझ में आ जाता है कि यह एक बुरे राजनीतिक चुटकुले से ज़्यादा और कुछ भी नहीं है। संघ के किसी भी नेता ने कभी भी ब्रिटिश सरकार के खिलाफ़ अपना मुँह नहीं खोला। जब भी संघी किसी कारण पकड़े गए तो उन्होंने बिना किसी हिचक के माफ़ीनामे लिख कर, अंग्रेजी हुकूमत के प्रति अपनी वफ़ादारी साबित की है। स्वयं पूर्व प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपयी ने भी यही काम किया था। संघ ने किसी भी ब्रिटिश साम्राज्यवाद विरोधी आन्दोलन में हिस्सा नहीं लिया। ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ के दौरान संघ ने उसका बहिष्कार किया। संघ ने हमेशा ब्रिटिश शासन के प्रति अपनी वफ़ादारी बनायी रखी और देश में साम्प्रदायिकता फैलाने का अपना काम बखूबी किया। वास्तव में साम्प्रदायिकता फैलाने की पूरी साज़िश तो ब्रिटिश उपनिवेशवादियों के ही दिमाग़ की पैदावार थी और ‘बाँटो और राज करो’ की उनकी नीति का हिस्सा थी। लिहाज़ा, संघ के इस काम से उपनिवेशवादियों को भी कभी कोई समस्या नहीं थी। ब्रिटिश उपनिवेशवादी राज्य ने भी इसी वफ़ादारी का बदला चुकाया और हिन्दू साम्प्रदायिक फ़ासीवादियों को कभी अपना निशाना नहीं बनाया। आर.एस.एस. ने हिन्दुत्व के अपने प्रचार से सिर्फ़ और सिर्फ़ साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ हो रहे देशव्यापी आन्दोलन से उपजी कौमी एकजुटता को तोड़ने का प्रयास किया। ग़ौरतलब है कि अपने साम्प्रदायिक प्रचार के निशाने पर आर.एस.एस. ने हमेशा मुसलमानों, कम्युनिस्टों और ट्रेड यूनियन नेताओं को रखा और ब्रिटिश शासन की सेवा में तत्पर रहे। संघ कभी भी ब्रिटिश शासन-विरोधी नहीं था, यह बात गोलवलकर के 8 जून, 1942 में आर.एस.एस. के नागपुर हेडक्वार्टर पर दिए गए भाषण से साफ़ हो जाती है – “संघ किसी भी व्यक्ति को समाज के वर्तमान संकट के लिये ज़िम्मेदार नहीं ठहराना चाहता। जब लोग दूसरों पर दोष मढ़ते हैं तो असल में यह उनके अन्दर की कमज़ोरी होती है। शक्तिहीन पर होने वाले अन्याय के लिये शक्तिशाली को ज़िम्मेदार ठहराना व्यर्थ है।…जब हम यह जानते हैं कि छोटी मछलियाँ बड़ी मछलियों का भोजन बनती हैं तो बड़ी मछली को ज़िम्मेदार ठहराना सरासर बेवकूफ़ी है। प्रकृति का नियम चाहे अच्छा हो या बुरा सभी के लिये सदा सत्य होता है। केवल इस नियम को अन्यायपूर्ण कह देने से यह बदल नहीं जाएगा।” अपनी बात को स्पष्ट करने के लिये इतिहास के उस कालक्रम पर रोशनी डालेंगे जहाँ संघ की स्थापना होती है। यहीं संघ की जड़ों में बसी प्रतिक्रियावादी विचारधारा स्पष्ट हो जाएगी।

आर.एस.एस. की स्थापना 1925 में नागपुर में विजयदशमी के दिन हुई थी। केशव बलिराम हेडगेवार आर.एस.एस. के संस्थापक थे। भारत में फ़ासीवाद उभार की ज़मीन एक लम्बे अर्से से मौजूद थी। आज़ादी के पहले 1890 और 1900 के दशक में भी हिन्दू और इस्लामी पुनुरुत्थानवादी ताकतें मौजूद थी पर उस समय के कुछ प्रगतिवादी राष्ट्रवादी नेताओं के प्रयासों द्वारा हिन्दू व इस्लामी पुनरुत्थानवादी प्रतिक्रियावाद ने कोई उग्र रूप नहीं लिया। फ़ासीवादी उभार की ज़मीन हमेशा पूँजीवादी विकास से पैदा होने वाली बेरोज़गारी, गरीबी, भुखमरी, अस्थिरता, असुरक्षा, और आर्थिक संकट से तैयार होती है। भारत ब्रिटिश साम्राज्य का उपनिवेश था। यहाँ पूँजीवाद अंग्रेज़ों द्वारा आरोपित औपनिवेशक व्यवस्था के भीतर पैदा हुआ। एक उपनिवेश होने के कारण भारत को पूँजीवाद ब्रिटेन से गुलामी के तोहफ़े के तौर पर मिला। भारत में पूँजीवाद किसी बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति के ज़रिये नहीं आया। इस प्रकार से आये पूँजीवाद में जनवाद, आधुनिकता, तर्कशीलता जैसे वे गुण नहीं थे जो यूरोप में क्रान्तिकारी रास्ते से आये पूँजीवाद में थे। इस रूप में यहाँ का पूँजीपति वर्ग भी बेहद प्रतिक्रियावादी, अवसरवादी और कायर किस्म का था जो हर प्रकार के प्रतिक्रियावाद को प्रश्रय देने को तैयार था। आज़ादी के बाद यहाँ हुए क्रमिक भूमि सुधारों के कारण युंकरों जैसा एक पूँजीवादी भूस्वामी वर्ग भी मौजूद था। गाँवों में भी परिवर्तन की प्रक्रिया बेहद क्रमिक और बोझिल रही जिसने संस्कृति और सामाजिक मनोविज्ञान के धरातल पर प्रतिक्रिया के लिए एक उपजाऊ ज़मीन मुहैया करायी। निश्चित तौर पर, उन्नत पूँजीवादी देशों में भी, जहाँ पूँजीवादी जनवादी क्रान्तियाँ हुई थीं, फासीवादी उभार हो सकता है और आज हो भी रहा है। लेकिन निश्चित तौर पर फासीवादी उभार की ज़मीन उन समाजों में ज़्यादा मज़बूत होगी जहाँ आधुनिक पूँजीवादी विकृति, रुग्णता, बर्बादी और तबाही के साथ मध्ययुगीन सामन्ती बर्बरता, निरंकुशता और पिछड़ापन मिल गया हो। भारत में ऐसी ज़मीन आज़ादी के बाद पूँजीवादी विकास के शुरू होने के साथ फासीवादी ताक़तों को मिली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हिन्दुत्ववादी फासीवाद इसी ज़मीन पर पला-बढ़ा है।

आज जब पूँजीवाद अपने संकट का बोझ मज़दूर वर्ग और आम मेहनतकश आबादी पर डाल रहा है और महँगाई, बेरोज़गारी और भूख से उन पर कहर बरपा कर रहा है, तो जनता के आन्दोलन भी सड़कों पर फूट रहे हैं। चाहे वह मज़दूरों के आन्दोलन हों, ठेके पर रखे गये शिक्षकों, नर्सों और अन्य कर्मकारों के आन्दोलन हों, या फिर शिक्षा और रोज़गार के अधिकार के लिए छात्रों-युवाओं के आन्दोलन हों। यदि कोई क्रान्तिकारी विकल्प न हो तो पूँजीवाद के इसी संकट से समाज में उजड़ा हुआ टुटपुँजिया पूँजीपति वर्ग और लम्पट सर्वहारा वर्ग फ़ासीवादी प्रतिक्रिया का आधार बनते हैं। । ब्रिटिश भारत में भी फासीवादी विचारधारा का सामाजिक आधार इन्हीं वर्गों के ज़रिये पैदा हुआ था।

भारत के महाराष्ट्र में ऐसा टटपूँजिया वर्ग मौजूद था। महाराष्ट्र के व्यापारी और ब्राह्मण ही आर.एस.एस. का शुरुआती आधार बने। 1916 के लखनऊ समझौते और खिलाफ़त आन्दोलन के मिलने से धार्मिक सौहार्द्र की स्थिति बनी रही। परन्तु इस दौरान भी ‘हिन्दू महासभा’ जैसे हिन्दू साम्प्रदायिक संगठन मौजूद थे। गाँधी द्वारा असहयोग आन्दोलन के अचानक वापस लिए जाने से एक हताशा फैली और ठहराव की स्थिति आयी। इतिहास गवाह है कि ऐसी हताशा और ठहराव की स्थितियों में ही प्रतिक्रियावादी ताक़तें सिर उठाती हैं और जनता को ‘गलत रास्ते पर ले जाने में सफल हो जाती हैं’ जैसा कि भगतसिंह ने कहा था। भारत का बुर्जुआ वर्ग एक तरफ़ साम्राज्यवाद से राजनीतिक स्वतन्त्रता चाहता था, तो वहीं वह मज़दूरों और किसानों के जाग जाने और विद्रोह का रास्ता अख्‍त़ियार करने से लगातार भयभीत भी रहता था। इसीलिए गाँधी ने कभी मज़दूरों को संगठित करने का प्रयास नहीं किया; उल्टे जब गुजरात के मज़दूरों ने गाँधी का जुझारू तरीके से साथ देने की पेशकश की तो गाँधी ने उन्हें शान्तिपूवर्क काम करने की हिदायत दी और कहा कि मज़दूर वर्ग को राजनीतिक तौर पर छेड़ा नहीं जाना चाहिए। यही कारण था कि असहयोग आन्दोलन के क्रान्तिकारी दिशा में मुड़ने के पहले संकेत मिलते ही गाँधी ने कदम पीछे हटा लिये और अंग्रेज़ों से समझौता कर लिया। भारतीय रुग्ण पूँजीपति वर्ग का राजनीतिक चरित्र ही दोहरा था। इसलिए उसने पूरी स्वतन्त्रता की लड़ाई में कभी आमूलगामी रास्ता अख्‍त़ियार नहीं किया और हमेशा ‘दबाव-समझौता-दबाव’ की रणनीति अपनायी ताकि जनता की क्रान्तिकारी पहलकदमी को निर्बन्ध किये बिना, एक समझौते के रास्ते एक पूँजीवादी राजनीतिक स्वतन्त्रता मिल जाये। गाँधी और कांग्रेस की यह रणनीति भी भारत में फासीवाद के उदय के लिए ज़िम्मेदार थी। मिसाल के तौर पर असहयोग आन्दोलन के वापस लिये जाने के बाद जो हताशा फैली उसी के कारण प्रतिक्रियावादी ताक़तें हिन्दू-मुस्लिम एकता को तोड़ने में सफल हुईं। एक तरफ़ इस्लामी कट्टरपंथ तो दूसरी ओर हिन्दू पुनरुत्थानवाद की लहर चल पड़ी। सावरकर बंधुओं का समय यही था। आर.एस.एस. की स्थापना इन्हीं सब घटनाओं की पृष्ठभूमि में हुई।

संघ के संस्थापक हेडगेवार संघ के निर्माण से पहले कांग्रेस के साथ जुड़े थे। 1921 में ख़िलाफ़त आन्दोलन के समर्थन में दिए अपने भाषण की वजह से उन्हें एक साल की जेल हुई। आर.एस.एस. के द्वारा ही छापी गयी उनकी जीवनी “संघवृक्ष के बीज” में लिखा है कि जेल में रहते हुए स्वतंत्रता संग्राम में हासिल हुए अनुभवों ने उनके मस्तिष्क में कई सवाल पैदा किये और उन्हें लगा कि कोई और रास्ता ढूँढा जाना चाहिए। इसी किताब में यह भी लिखा हैं कि हिन्दुत्व की ओर हेडगेवार का रुझान 1925 में शुरू हुआ। बात साफ़ है, जेल जाने के पश्चात जो “बौद्धिक ज्ञान” उन्हें हासिल हुआ उसके बाद उन्होंने आर.एस.एस. की स्थापना कर डाली। हेडगेवार जिस व्यक्ति के सम्पर्क में फ़ासीवादी विचारों से प्रभावित हुए वह था मूंजे। मूंजे वह तार है जो आर.एस.एस. के संस्थापक हेडगेवार और मुसोलिनी के फ़ासीवादी विचारों से संघ की विचारधारा को जोड़ता है। मज़ि‍र्आ कसोलरी नामक एक इतालवी शोधकर्ता ने आर.एस.एस. के संस्थापकों और नात्सियों व इतालवी फ़ासीवादियों के बीच के सम्पर्कों पर गहन शोध किया है। कसोलरी के अनुसार हिन्दू राष्ट्रवादियों की फ़ासीवाद और मुसोलिनी में रुचि कोई अनायास होने वाली घटना नहीं है, जो केवल चन्द लोगों तक सीमित थी, बल्कि यह हिन्दू राष्ट्रवादियों, ख़ासकर महाराष्ट्र में रहने वाले हिन्दू राष्ट्रवादियों के इतालवी तानाशाही और उनके नेताओं की विचारधारा से सहमति का नतीजा था। इन पुनरुत्थानवादियों को फ़ासीवाद एक “रूढ़िवादी क्रान्ति” के समान प्रतीत होता था। इस अवधारणा पर मराठी प्रेस ने इतालवी तानाशाही की उसके शुरुआती दिनों से ही खूब चर्चा की। 1924-1935 के बीच आर.एस.एस. से करीबी रखने वाले अखबार ‘केसरी’ ने इटली में फ़ासीवाद और मुसोलिनी की सराहना में कई सम्पादकीय और लेख छापे। जो तथ्य मराठी पत्रकारों को सबसे अधिक प्रभावित करता था वह था फ़ासीवाद का “समाजवाद” से उद्भव, जिसने इटली को एक पिछड़े देश से एक विश्व शक्ति के रूप में परिवर्तित कर दिया। अपने सम्पादकियों की एक श्रृंखला में केसरी ने इटली के उदारवादी शासन से तानाशाही तक की यात्रा को अराजकता से एक अनुशासित स्थिति की स्थापना बताया। मराठी अखबारों ने अपना पर्याप्त ध्यान मुसोलिनी द्वारा किये गए राजनीतिक सुधारों पर केन्द्रित रखा, ख़ास तौर पर संसद को हटा कर उसकी जगह ‘ग्रेट कॅाउंसिल ऑफ़ फ़ासिज़्म’ की स्थापना। इन सभी तथ्यों से यह साफ़ हो जाता है कि 1920 के अन्त तक महाराष्ट्र में मुसोलिनी की फ़ासीवादी सत्ता अखबारों के माध्यम से काफ़ी प्रसिद्धि प्राप्त कर रही थी। फ़ासीवाद का जो पहलू हिन्दू राष्ट्रवादियों को सबसे अधिक आकर्षक लगा वह था समाज का सैन्यकरण जिसने एक तानाशाह की अगुवाई में समाज का रूपान्तरण कर दिया था। इस लोकतंत्र-विरोधी व्यवस्था को हिन्दू राष्ट्रवादियों द्वारा ब्रिटिश मूल्यों वाले लोकतंत्र के मुकाबले एक सकारात्मक विकल्प के रूप में देखा गया।

पहला हिन्दू राष्ट्रवादी जो फ़ासीवाद सत्ता के सम्‍पर्क में आया वह था हेडगेवार का उस्ताद मुंजे। मुंजे ने संघ को मज़बूत करने और उसे देशव्यापी संस्था बनाने की अपनी इच्छा व्यक्त की, जो जगजाहिर है। 1931 फ़रवरी-मार्च के बीच मूंजे ने राउण्ड टेबल कान्फ्रेंस से लौटते हुए यूरोप की यात्रा की, जिस दौरान उसने मुसोलिनी से मुलाकात भी की। मूंजे ने रोम में इतालवी फ़ासीवादियों के मिलिट्री कॅालेज – फ़ासिस्ट अकेडमी ऑफ़ फिजिकल एजुकेशन, सेंट्रल मिलिट्री स्कूल ऑफ़ फ़िजिकल एजुकेशन और इन सबमें से सबसे महत्वपूर्ण बलिल्ला और एवां गारडिस्ट आर्गेनाइजेशन के गढ़ों को जाकर बहुत बारीकी से देखा। इससे मुंजे बहुत प्रभावित हुआ। ये स्कूल या कॉलेज शिक्षा के केंद्र नहीं थे बल्कि मासूम बच्चों और लड़कों के दिमागों में ज़हर गोलकर, उनका ‘ब्रेनवॉश’ करने के सेण्टर थे। यहाँ 6 वर्ष से 18 वर्ष की आयु के युवकों की भर्ती कर उन्हें फ़ासीवादी विचारधारा के अधीन करने के पूरे इंतज़ाम थे। आर.एस.एस. का यह दावा कि इसका ढाँचा हेडगेवार के काम और सोच का नतीजा था एक सफ़ेद झूठ है क्योंकि संघ के स्कूल व अन्य संस्थाएँ और खुद संघ का पूरा ढाँचा इतावली फ़ासीवाद पर आधारित है। और उनसे हूबहू मेल खाता है। भारत वापस आते ही, मुंजे ने हिन्दुओं के सैन्यीकरण की अपनी योजना ज़मीन पर उतारनी शुरू कर दी। पुणे पहुँच कर मुंजे ने “द मराठा” को दिए एक साक्षात्कार में हिन्दू समुदाय के सैन्यीकरण के सम्बन्धों में निम्नलिखित बयान दिया, “नेताओं को जर्मनी के युवा आन्दोलन, बलिल्ला और इटली की फ़ासीवादी संगठनों से सीख लेनी चाहिए।”

मुंजे और आर.एस.एस. की करीबी और इनकी फ़ासीवादी विचारधारा की पुष्टि 1933 में ब्रिटिश सूत्रों में छपी खुफ़िया विभाग की रिपोर्ट से हो जाती है। इस रिपोर्ट का शीर्षक था “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर टिप्पणी” जिसमें संघ के मराठी भाषी क्षेत्रों में पुर्नगठन का ज़िम्मेदार मुंजे को ठहराया गया है। इस रिपोर्ट में आर.एस.एस. के चरित्र, इनकी गतिविधियों के बारे में कहा था कि – “यह कहना सम्भवतः कोई अतिशयोक्ति नहीं होगा कि संघ भविष्य में भारत के लिए वह बनना चाहता है जो फ़ासीवादी इटली के लिए हैं और नात्सी लोग जर्मनी के लिए हैं।” (नेशनल आर्काइव ऑफ़ इण्डिया) 1934 में मुंजे ने अपनी एक संस्था “भोंसला मिलिट्री स्कूल” की नींव रखी, उसी साल मुंजे ने “केन्द्रीय हिन्दू सैन्य शिक्षा समाज’, जिसका मुख्य उद्देश्य हिन्दुओं के सैन्य उत्थान और हिन्दू युवाओं को अपनी मातृभूमि कि रक्षा करने योग्य बनाना था, की बुनियाद भी रखी। जब भी मुंजे को हिन्दू समाज के सैन्यकरण के व्यावहारिकता का उदहारण देने की ज़रूरत महसूस हुई तो उसने इटली की सेना और अर्द्धसेना ढाँचे के बारे में जो स्वयं देखा था, वह बताया। मुंजे ने बलिल्ला और एवां गार्डिस्टों के सम्बन्ध में विस्तारित विवरण दिए। जून 1938 में मुम्बई में स्थित इतावली वाणिज्य दूतावास ने भारतीय विद्यार्थियों को इतालवी भाषा सिखने के लिए भर्ती शुरू की, जिसके पीछे मुख्य उद्देश्य युवाओं को इटली के फ़ासीवादी प्रचार का समर्थक बनाना था। मारिओ करेली नाम के एक व्यक्ति को इस कार्य के लिए रोम से भारत भेजा गया। भर्ती किये गए विद्यार्थियों में से एक माधव काशीनाथ दामले, ने करेली के सुझाव के बाद मुसोलिनी की पुस्तक “फ़ासीवाद का सिद्धांत” का मराठी में अनुवाद किया और उसे 1939 में एक  श्रृंखलाबद्ध तरीके से लोहखंडी मोर्चा (आयरन फ्रण्ट) नामक पत्रिका में छापा गया। महाराष्ट्र में फैले फ़ासीवादी प्रभाव का एक और उदाहरण एम.आर. जयकर, जो हिन्दू महासभा के एक प्रतिष्ठित नेता थे, द्वारा गठित ‘स्वास्तिक लीग’ थी। 1940 में नात्सियों के असली चरित्र के सामने आने के साथ इस लीग ने खुद को नात्सीवाद से अलग कर लिया।

ओरिजीत सेन का कार्टून

1930 के अन्त तक, आर.एस.एस. की पैठ महाराष्ट्र के ब्राह्मण समाज में बन गयी थी। हेडगेवार ने मुंजे के विचारों से सहमति ज़ाहिर करते हुए, संघ की शाखाओं में फ़ासीवादी प्रशिक्षण की शुरुआत की। लगभग इसी समय विनायक दामोदर सावरकर, जिसके बड़े भाई राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापकों में से एक थे, ने जर्मनी के नात्सियों द्वारा यहूदियों के सफ़ाये को सही ठहराया और भारत में मुसलमानों की “समस्या” का भी यही समाधान सुझाया। जर्मनी में “यहूदी प्रश्न’ का अन्तिम समाधान सावरकर के लिए मॉडल था। संघियों के लिए राष्ट्र के सबसे बड़े दुश्मन थे मुसलमान! ब्रिटिश साम्राज्य उनकी निन्दा या क्रोध का कभी पात्र नहीं था। आर.एस.एस. ऐसी गतिविधियों से बचता था जो अंग्रेजी सरकार के खिलाफ़ हों। संघ द्वारा ही छपी हेडगेवार की जीवनी जिसका ज़िक्र पहले भी लेख में किया जा चुका है, में ‘डाक्टर साहब’ की स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका का वर्णन करते हुए बताया गया है कि संघ स्थापना के बाद ‘डाक्टर साहब’ अपने भाषणों में हिन्दू संगठन के सम्बन्ध में ही बोला करते थे। सरकार पर प्रत्यक्ष टीका न के बराबर रहा करती थी। हेडगेवार ने मृत्यु से पहले गोलवलकर को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। गोलवलकर 1940 से 1973 तक संघ के सुप्रीमो रहे। गोलवलकर के ही नेतृत्व में संघ के वे सभी संगठन अस्तित्व में आये जिन्हें हम आज जानते हैं। गोलवलकर ने संघ की फ़ासीवादी विचारधारा को एक सुव्यवस्थित रूप दिया और इसकी पहुँच को महाराष्ट्र के ब्राह्मणों से बाहर निकाल अखिल भारतीय संगठन का रूप दिया। संघ ने इसी दौरान अपने स्कूलों का नेटवर्क देश भर में फैलाया। संघ की शाखाएँ भी गोलवलकर के नेतृत्व में पूरे देश में बड़े पैमाने पर फैलीं। यही कारण है कि संघ के लोग उन्हें गुरु जी कहकर सम्बोधित करते हैं।

इनके किये-धरे पर लिखना हो तो पूरी किताब लिखी जा सकती है। और कई अच्छी किताबें मौजूद भी हैं परन्तु हमारा यह मकसद नहीं था। हमारा यहाँ सिर्फ़ यह मकसद था कि यह दिखाया जाए कि संघ का विचारधारात्मक, राजनीतिक और सांगठनिक ढाँचा एक फ़ासीवादी संगठन का ढाँचा है। इसकी विचारधारा फ़ासीवाद है। अपने को राष्ट्रवादी कहने वाले और इटली व जर्मनी के फासीवादियों व नात्सियों से उधार ली निक्कर, कमीज़ और टोपी पहन कर इन मानवद्रोहियों ने देश और धर्म के नाम पर अब तक जो उन्माद फैलाया है वह फ़ासीवादी विचारधारा को भारतीय परिस्थितियों में लागू करने का नतीजा है। भारतीय संस्कृति, भारतीय अतीत के गौरव, और भाषा आदि की दुहाई देना तो बस एक दिखावा है। संघ परिवार तो अपनी विचारधारा, राजनीति, संगठन और यहाँ तक कि पोशाक से भी पश्चिमपरस्त है! और पश्चिम का अनुसरण करने में भी इसने वहाँ के जनवादी और प्रगतिशील आदर्शों का अनुसरण करने की बजाय, वहाँ की सबसे विकृत, मानवद्रोही और बर्बर विचारधारा, यानी कि फासीवाद-नात्सीवाद का अनुसरण किया है। हमारा मक़सद ‘संस्कृति’, ‘धर्म’ और ‘राष्ट्रवाद’ की दुहाई देने वाले इन फासीवादियों की असली जन्मकुण्डली को आपके सामने खोलकर रखना था, क्योंकि पढ़ी-लिखी आबादी और विशेषकर नौजवानों का एक हिस्सा भी देशभक्ति करने के महान उद्देश्य से इन देशद्रोहियों के चक्कर में फँस जाता है। इसलिए ज़रूरी है कि इनके पूरे इतिहास को जाना जाय और समझा जाय कि देशप्रेम, राष्ट्रप्रेम से इनका कभी लेना-देना था ही नहीं। यह देश में पूँजीपतियों की नंगी तानाशाही लागू करने के अलावा और कुछ नहीं करना चाहते।

Monday, 12 October 2015

Religion- A Tool of Politics

Swami Vivekananda's Chicago Speech,
Parliament of Religion,11th September, 1893
An excerpt of speech-
If the
Parliament of Religions has shown anything to the world it is this: It has proved to the world
that holiness, purity and charity are not the exclusive possessions of any church in the world,
and that every system has produced men and women of the most exalted character. In the
face of this evidence, if anybody dreams of the exclusive survival of his own religion and the
destruction of the others, I pity him from the bottom of my heart, and point out to him that
upon the banner of every religion will soon be written, in spite of resistance: "Help and not
Fight," "Assimilation and not Destruction," "Harmony and Peace and not Dissension."

Today India is passing through worst anachronism of its form. The present government of India is trying to suppress & break the bond of commonality among people of different religion & castes. Forceful imposition of fascistic Hindu Rashtra is the underlying agenda of Narendra Modi led BJP government. Was this a message given by Swami Vivekananda? Did he ever tell to forcefully superimpose religion on others?

By drawing religious enemity among our own  countrymen will never lead to establish an egalitarian society with good growth & development.The politics of religion will be a rope around our neck, & will pull us back from progressing. The horrifying incident of Dadri (UP) where a man got killed for eating beef which wasn't a truth, murder of rational activist Comrade Govind Pansare in Maharashtra who stood against Putrakameshti Yajna, a hindu ritual that supposed results in a male child, Prof. M.M.Kalburgi was murdered for questioning ill  practices of religion in Karnataka. In 2013, Narendra Dabholkar was also killed because he posed biggest challenge to curb superstition practices in Maharashtra. In three years most vocal & rational voices of our country were gun down just because they had kept a spirit of inquiry &  supported Scientific temper which pops up many questions regarding silence of government over growing religious intolerance countrywide. RSS-BJP nexus efficiently uses this to consolidate Hindu votes against minorities. This leads to riot like situation. If any state is going for state assembly polls, such incidents of riots have been reported.

To maintain high standards of brotherhood in this country we as society need to revamp the existing conditions of diverse population by giving immense respect with good care. Shaheed Bhagat Singh said that religion must be separated from politics, only then the unity on political, social & economic front can be achieved. Set of individuals make up society & a peaceful society builds up a progressive nation.

Long Live India
Long Live Revolution
Inquilab Zindabad

Friday, 9 October 2015

We Shall Overcome!

A Hope for Indian Left's Revival

The Left is now virtually absent from the Indian political space. It is barely a contender in any of the coming elections. It is in power only in one state, Tripura. It has virtually no voice in Parliament or influence on policy. Its perspective is unheard of in the media. Its general ideology is either largely unknown or outrightly reviled. Leftist academics have descended into arcane and esoteric debates about poststructuralism and the like which reminds one of the medieval ‘dark age debates’ in Europe about how many angels could dance on the head of a pin. The litany list can continue but suffice to say that the Indian left is in the midst of a historically unprecedented decimation.
The impact of this on Indian polity is profound and the revival of the Left is very necessary. This article therefore lays out some suggestions as to how this could be done. These encompass larger questions of strategy as well as practical suggestions on tactics.
Focus on being in power, not on being in the opposition
The first and most fundamental question the Left must ask itself is this: does it want to be in power and bring about a change? Or does it want to be a watchdog and perennially point out the flaws of others?
This question has already been answered by the Left and it is of course that it wants to be a watchdog. That is the only explanation for why it is constantly in ‘opposition mode’. When one reads pamphlets or general leftist literature (all references are to the political Left unless mentioned otherwise) the following words are dominant: oppose, reject, resist, smash, destroy, fight against, down with and so on. The general tone is negative and the focus is on what should not be done, not on what should be done. The consequence of this is that it is unclear what the Left stands for, only what it stands against. The political message sent out to voters is thus a negative one that focuses on the flaws of others. In trying to fashion itself as a ‘force of resistance’ it has ended up being seen as a force of obstructionism. The electoral results of this strategy are evident.
The Left must therefore fundamentally change its strategy and focus firmly on being in power and bringing about a change. It must constantly say what it wants to do and reserve criticism for what comes in the way of those goals. This way the message will be loud and clear as to what the Left stands for. In this it has much to learn from the Aam Aadmi Party (AAP) and the BJP. The AAP started out on anti-corruption plank but then made it clear that they would provide a Lokpal, an honest government and a pro-poor administration. The BJP under Modi made it clear that they would provide a strong, stable government that would ensure ‘Sabka saath sabka vikaas’. This positive and consistent messaging coupled with excellent mobilisation and charismatic leadership was responsible for their subsequent victories, both stunning. The Left should adopt this strategy and focus on telling people what they want to do instead of what they don’t want others to do. Some examples:
1. “Free education for all” instead of “Resist commercialisation of education”
2. “Social peace and harmony” instead of “Reject communalism”
3. “Up up socialism” instead of “Down down capitalism”
This is the first and most important step for the Left. It must come to a firm consensus that it wants to be in power. It must then decide on a positive, practical and credible agenda which it can take before the public. This agenda must then be campaigned for using the aforementioned strategy of making it repeatedly clear what it stands for, and reserving criticism for what comes in the way of those goals.
Social democracy and socialism
What will be this agenda? The Left can study the Nordic model of social democracy that is practised in the Norselands of Sweden, Iceland, Denmark, etc. Salient features of this model are:
1. Strong social security, public pension plans, free education and universal healthcare.
2. Strong property rights, contract enforcement, and overall ease of doing business.
3. High unionisation combined with strong and responsible industrial associations. Here the German model is apt for India where the government ensures consultations between the two before laws are mandated. Efforts are made to maintain continuity of employment through recessions, and to use slack periods as opportunities to strengthen skills.
4. High direct taxation which specifically targets the rich and has a lower inflationary effect as compared to indirect taxation.
Thus this is a basically capitalist model where the government has a strong role in terms of regulation, social security and providing basic services. The Left can adopt this model with suitable alterations for the Indian context. This is necessary as it is a fact that capitalism and a market economy are here to stay in India, at least for a while. There is still plenty of space for growth for capitalism in India and it is a long way off from the crises of overproduction which the late industrial economies of the US and Western Europe are facing. Thus a pragmatic role for the Left would be to focus on being in power and managing capitalism to the best of its abilities.
Nevertheless, it must be made clear that this would be a compromise. The Left must retain its ultimate objective: world communism, which is a global society free of national boundaries and all property is publicly owned. This goal is what gives the Left its identity and in this day and age it is vital that this now-forgotten dream be once again revived and propagated to the people. Thus it must be constantly repeated that social democracy is only an intermediary step on the road to world communism.
Embrace pragmatism
One common pattern in Left parties across the world is their tendency to splinter at the drop of a hat and this is no different in India. The undivided Communist Party of India (CPI) broke up in 1964 into the CPI and CPM. Three years later the CPM further split into the CPM and the CPI-ML. Two years later the CPI-ML itself disintegrated into about 30-odd ultra-Left organisations. Contrast this with the Congress which was founded in 1885 and stayed united through the freedom struggle despite having hard Leftists such as JP Narayan and hard Rightists such as Purushottam Das Tandon.
The reason why the Left splits so easily is its doctrinaire approach and emphasis on ideological ‘purity’. Such an approach makes the leaders zealous and even fanatical (think Pol Pot) and unwilling to compromise. This is a dangerous attitude, especially for a democracy like India.
The Left must therefore wholeheartedly adopt an approach of pragmatism and compromise. The pragmatic approach would focus onpractical and immediate benefit over my-way or the highway ‘idealism’. It would not hesitate to negotiate, bargain and compromise (of course within limits) to further its objectives. The underlying principle of such an approach is that ‘a step ahead today is better than a giant leap in the future’. With this approach, it must not hesitate to capture power wherever possible. It is far better to be in power and do some good, even if one has to compromise on ideals along the way, than to be out of power, let a far worse party take control and sanctimoniously claim that one’s ideological purity is unsullied. This approach becomes all the more important when seen that the Left is literally facing an existential crisis and faces a very real chance of political obliteration.
Media presence
The emergence of social media offers an unprecedented opportunity for the Left to make their perspective known. However they have not yet taken full advantage of this. The only well-known Leftist on social media is Kavitha Krishnan, which is a shame given the galaxy of Leftist intellectuals. Members of all Left organisations must force their cadre to become active on Facebook, Twitter, LinkedIn (posts), YouTube, Pinterest, Tumblr, WhatsApp, Telegram, Snapchat and whatever other option they can get their hands on. These spaces are currently dominated by the mainstream parties and the Left perspective would be a powerful addition.
Secondly the internet has also made it very easy for self-hosting of content either through blogs or crowd-sourced publications. Left cadres and sympathisers must be encouraged to relentlessly and ceaseless make themselves heard on these spaces while at all times retaining the basic principle of making it clear what they stand for, not what they stand against.
A third and crucial space that they must capture is Wikipedia. It is a vital source of knowledge today and Left cadres and sympathisers must be trained on how to use and manage content on it. Currently there is a huge presence of right wing ideologues, especially from science and engineering backgrounds, on the site and this space must be reclaimed.
The mainstream media frequently ignores the Left and there have been some truly shameful media blackouts of trade union rallies and other mass left events. Nevertheless with regard to TV debates and the like, frequently the Left itself does not engage proactively. This must change and every opportunity must be taken to come on TV. The english media is a particularly important target as it ultimately sets the media discourse.
Mobilise, mobilise, mobilise
The ultimate strength of the Left however will be their organisational strength and ability to mobilise the masses on the ground. Here it must learn from the Hindutva right which has slowly and painstakingly managed to build a powerful organisational base which is now being used to wreak havoc on Indian society. The Left must get out of its elitist bubble and once again take a ‘back to the basics’ approach and spend time among the people, helping them with their issues such as getting job recommendations, electricity connections, transfers and the like. It is this sort of mundane work that is absolutely essential to strengthening an organisation on the ground, and was well recognised by Mahatma Gandhi who used to ensure that Congress party workers went into ‘social reconstruction mode’ after every mass movement so as to prepare the people for the next one.
These were some suggestions for the revival of the Indian Left. Fortunately, the majority of them require only a shift in perception and a change in strategy. It is only the last two which require a lot of effort. The Left still has a very strong place in the hearts of the Indian people, who long for government which is truly secular, pro-poor and most importantly wants to work hard for the development of the country. The victory of the AAP should serve as an inspiration to the Left in this regard and with the right steps hopefully they will once again retain their rightful place as an influential and major political force in India.
Abdul Muheet Chowdhary (abdulmc@gmail.com) is a legislative aide to B Vinod Kumar, Member of Parliament (Lok Sabha). Views expressed are personal.

Tuesday, 29 September 2015

The 108th birth anniversary

Shaheed-E-Azam Bhagat Singh-
The man with Reason.
28th September, 2015 marks the 108th birth anniversary of Shaheed Bhagat Singh. He lived for 23 years. In 7 years of political life, he worked tirelessly across length & breadth of this country to make India free from clutches of British colonial rule.
He was a well declared atheist but he envisioned India on Secular & Socialistic lines. He believed in critiques & practised reasoning. He often used to say-
"A revolutionary believes in reason more than anything. It is to reason & reason alone, that he bows". Growing religious intolerance in our country needs to be countered by his idea of Independent India.

Inquilab Zindabad!

BHAGAT SINGH & JOURNALISM

Bhagat Singh- A Well-versed Journalist


इंसान को संस्कार सिर्फ माता-पिता या परिवार से ही नहीं मिलते। समाज भी अपने ढंग से संस्कारों के बीज बोता है। पिछली सदी के शुरुआती साल कुछ ऐसे ही थे। उस दौर में संस्कारों और विचारों की जो फसल उगी, उसका असर आज भी दिखाई देता है। उन दिनों गोरी हुक़ूमत ने ज़ुल्मों की सारी सीमाएं तोड़ दीं थीं। देशभक्तों को कीड़े-मकौड़ों की तरह मारा जा रहा था। किसी को भी फांसी चढ़ा देना सरकार का शग़ल बन गया था। ऐसे में जब आठ साल के बालक भगत सिंह ने किशोर क्रांतिकारी करतार सिंह सराभा को वतन के लिए हंसते हंसते फांसी के तख़्ते चढ़ते देखा तो हमेशा के लिए करतार देवता की तरह उसके बालमन के मंदिर में प्रतिष्ठित हो गए। चौबीस घंटे करतार की तस्वीर भगत सिंह के साथ रहती। सराभा की फांसी के रोज़ क्रांतिकारियों ने जो गीत गाया था, वो भगत सिंह अक्सर गुनगुनाया करता। इस गीत की कुछ पंक्तियां थीं –

फ़ख्र है भारत को ऐ करतार तू जाता है आज
जगत औ पिंगले को भी साथ ले जाता है आज
हम तुम्हारे मिशन को पूरा करेंगे संगियो
क़सम हर हिंदी तुम्हारे ख़ून की खाता है आज

कुछ बरस ही बीते थे कि जलियां वाला बाग़ का बर्बर नरसंहार हुआ। सारा देश बदले की आग में जलने लगा। भगत सिंह का ख़ून खौल उठा। कुछ संकल्प अवचेतन में समा गए। अठारह सौ सत्तावन के ग़दर से लेकर कूका विद्रोह तक जो भी साहित्य मिला, अपने अंदर पी लिया। एक एक क्रांतिकारी की कहानी किशोर भगत सिंह की ज़ुबान पर थी। होती भी क्यों न। परिवार की कई पीढ़ियां अंग्रेज़ी राज से लड़तीं आ रहीं थीं। दादा अर्जुन सिंह, पिता किशन सिंह, चाचा अजीत सिंह और चाचा स्वर्ण सिंह को देश के लिए मर मिटते भगत सिंह ने देखा था। चाचा स्वर्ण सिंह सिर्फ तेईस साल की उमर में जेल की यातनाओं का विरोध करते हुए शहीद हो चुके थे। दूसरे चाचा अजीत सिंह को देश निकाला दिया गया था। दादा और पिता आए दिन आंदोलनों की अगुआई करते जेल जाया करते थे। पिता गांधी और कांग्रेस के अनुयायी थे तो चाचा गरम दल की विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते थे। घर में घंटों बहसें होतीं थीं। भगत सिंह के ज़ेहन में विचारों की फसल पकती रही।

सोचिए! भगत सिंह पंद्रह-सोलह साल के थे और नेशनल कॉलेज लाहौर में पढ़ रहे थे। देश को आज़ादी कैसे मिले- इस पर अपने शिक्षकों और सहपाठियों से चर्चा किया करते थे। जितनी अच्छी हिंदी और उर्दू, उतनी ही अंग्रेज़ी और पंजाबी। इसी कच्ची आयु में भगत सिंह ने पंजाब में उठे भाषा विवाद पर झकझोरने वाला लेख लिखा। लेख पर हिंदी साहित्य सम्मेलन ने पचास रुपए का इनाम दिया। भगत सिंह की शहादत के बाद 28 फ़रवरी, 1933 को हिंदी संदेश में यह लेख प्रकाशित हुआ था। लेख की भाषा और विचारों का प्रवाह अद्भुत है। एक हिस्सा यहां प्रस्तुत है- “इस समय पंजाब में उर्दू का ज़ोर है।

अदालतों की भाषा भी यही है। यह सब ठीक है परन्तु हमारे सामने इस समय मुख्य प्रश्न भारत को एक राष्ट्र बनाना है। एक राष्ट्र बनाने के लिए एक भाषा होना आवश्यक है, परन्तु यह एकदम नहीं हो सकता। उसके लिए क़दम क़दम चलना पड़ता है। यदि हम अभी भारत की एक भाषा नहीं बना सकते तो कम से कम लिपि तो एक बना देना चाहिए। उर्दू लिपि सर्वांग-संपूर्ण नहीं है। फिर सबसे बड़ी बात तो यह है कि उसका आधार फारसी पर है। उर्दू कवियों की उड़ान चाहे वो हिंदी (भारतीय) ही क्यों न हों- ईरान के साक़ी और अरब के खजूरों तक जा पहुंचती है। क़ाज़ी नज़र -उल-इस्लाम की कविता में तो धूरजटी, विश्वामित्र और दुर्वासा की चर्चा बार बार है, लेकिन हमारे उर्दू, हिंदी, पंजाबी कवि उस ओर ध्यान तक न दे सके। क्या यह दुःख की बात नहीं? इसका मुख्य कारण भारतीयता और भारतीय साहित्य से उनकी अनभिज्ञता है। उनमें भारतीयता आ ही नहीं पाती, तो फिर उनके रचे गए साहित्य से हम कहां तक भारतीय बन सकते हैं?… तो उर्दू अपूर्ण है और जब हमारे सामने वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित सर्वांग-संपूर्ण हिंदी लिपि विधमान है, फिर उसे अपने अपनाने में हिचक क्यों?.. हिंदी के पक्षधर सज्जनों से हम कहेंगे कि हिंदी भाषा ही अंत में एक दिन भारत की भाषा बनेगी, परंतु पहले से ही उसका प्रचार करने से बहुत सुविधा होगी।

सोलह-सत्रह बरस के भगत सिंह की इस भाषा पर आप क्या टिप्पणी करेंगे? इतनी सरल और कमाल के संप्रेषण वाली भाषा भगत सिंह ने बानवे-तिरानवे साल पहले लिखी थी। आज भी भाषा के पंडित और पत्रकारिता के पुरोधा इतनी आसान हिंदी नहीं लिख पाते और माफ़ कीजिए हमारे अपने घरों के बच्चे क्या सोलह-सत्रह की उमर में आज इतने परिपक्व हो पाते हैं। नर्सरी-केजी-वन, केजी-टू के रास्ते पर चलकर इस उमर में वे दसवीं या ग्यारहवीं में पढ़ते हैं और उनके ज्ञान का स्तर क्या होता है- बताने की ज़रूरत नहीं। इस उमर तक भगत सिंह विवेकानंद, गुरुनानक, दयानंद सरस्वती, रवींद्रनाथ ठाकुर और स्वामी रामतीर्थ जैसे अनेक भारतीय विद्वानों का एक-एक शब्द घोंट कर पी चुके थे। यही नहीं विदेशी लेखकों-दार्शनिकों और व्यवस्था बदलने वाले महापुरुषों में गैरीबाल्डी और मैजिनी, कार्ल मार्क्स, क्रोपाटकिन, बाकुनिन और डेनब्रीन तक भगत सिंह की आँखों के साथ अपना सफ़र तय कर चुके थे।

उम्र के इसी पड़ाव पर परंपरा के मुताबिक़ परिवार ने उनका ब्याह रचाना चाहा तो पिता जी को एक चिठ्ठी लिखकर घर छोड़ दिया। सोलह साल के भगत सिंह ने लिखा,

पूज्य पिता जी,
नमस्ते!

मेरी ज़िंदगी भारत की आज़ादी के महान संकल्प के लिए दान कर दी गई है। इसलिए मेरी ज़िंदगी में आराम और सांसारिक सुखों का कोई आकर्षण नहीं है। आपको याद होगा कि जब मैं बहुत छोटा था, तो बापू जी (दादाजी) ने मेरे जनेऊ संस्कार के समय ऐलान किया था कि मुझे वतन की सेवा के लिए वक़्फ़ (दान) कर दिया गया है। लिहाज़ा मैं उस समय की उनकी प्रतिज्ञा पूरी कर रहा हूं। उम्मीद है आप मुझे माफ़ कर देंगे।

आपका ताबेदार
भगतसिंह

घर छोड़कर भगतसिंह जा पहुंचे थे कानपुर। महान देशभक्त पत्रकार गणेश शंकर वद्यार्थी उन दिनों कानपुर से प्रताप का प्रकाशन करते थे। वे तब बलवंत सिंह के नाम से लिखा करते थे। उनके विचारोतेजक लेख प्रताप में छपते और उन्हें पढ़कर लोगों के दिलो दिमाग में क्रांति की चिनगारी फड़कने लगती। उन्हीं दिनों कलकत्ते से साप्ताहिक ‘मतवाला’ निकलता था। मतवाला में लिखे उनके दो लेख बेहद चर्चित हुए। एक का शीर्षक था- विश्वप्रेम। पंद्रह और बाईस नवंबर 1924 को दो किस्तों में यह लेख प्रकाशित हुआ। लेख के इस हिस्से में देखिए भगत सिंह के विचारों की क्रांतिकारी अभिव्यक्ति।

“जब तक काला-गोरा, सभ्य-असभ्य, शासक-शासित, अमीर-ग़रीब, छूत-अछूत आदि शब्दों का प्रयोग होता है, तब तक कहां विश्व बंधुत्व और कहां विश्व प्रेम? यह उपदेश स्वतंत्र जातियां दे सकती हैं। भारत जैसा ग़ुलाम देश तो इसका नाम भी नहीं ले सकता। फिर उसका प्रचार कैसे होगा? तुम्हें शक्ति एकत्र करनी होगी। शक्ति एकत्रित करने के लिए अपनी एकत्रित शक्ति ख़र्च कर देनी पड़ेगी। राणा प्रताप की तरह ज़िंदगी भर दर-दर ठोकरें खानी होंगी, तब कहीं जाकर उस परीक्षा में उतीर्ण हो सकोगे। ……तुम विश्व प्रेम का दम भरते हो। पहले पैरों पर खड़े होना सीखो। स्वतंत्र जातियों में अभिमान के साथ सिर ऊंचा करके खड़े होने के योग्य बनो। जब तक तुम्हारे साथ कामागाटा मारु जहाज़ जैसे दुव्यवहार होते रहेंगे, तब तक डैम काला मैन कहलाओगे, जब तक देश में जालियांवाला बाग़ जैसे भीषण कांड होंगे, जब तक वीरागंनाओं का अपमान होगा और तुम्हारी ओर से कोई प्रतिकार न होगा, तब तक तुम्हारा यह ढ़ोंग कुछ मानी नहीं रखता। कैसी शांती, कैसा सुख और कैसा विश्व प्रेम? यदि वास्तव में चाहते हो तो पहले अपमानों का प्रतिकार करना सीखो। मां को आज़ाद कराने के लिए कट मरो। बंदी मां को आज़ाद कराने के लिए आजन्म कालेपानी में ठोकरें खाने को तैयार हो जाओ। मरने को तत्पर हो जाओ।

मतवाला में ही भगत सिंह का दूसरा लेख सोलह मई, 1925 को बलवंत सिंह के नाम से छपा। ध्यान दिलाने की ज़रूरत नहीं कि उन दिनों अनेक क्रांतिकारी छद्म नामों से लिखा करते थे। युवक शीर्षक से लिखे गए लेख का एक टुकड़ा प्रस्तुत है-

“अगर रक्त की भेंट चाहिए तो सिवा युवक के कौन देगा? अगर तुम बलिदान चाहते हो तो तुम्हे युवक की ओर देखना होगा। प्रत्येक जाति के भाग्य विधाता युवक ही होते हैं। ……सच्चा देशभक्त युवक बिना झिझक मौत का आलिंगन करता है, संगीनों के सामने छाती खोलकर डट जाता है, तोप के मुंह पर बैठकर मुस्कुराता है, बेड़ियों की झनकार पर राष्ट्रीय गान गाता है और फांसी के तख्ते पर हंसते हंसते चढ़ जाता है। अमेरिकी युवा पैट्रिक हेनरी ने कहा था, जेल की दीवारों के बाहर ज़िंदगी बड़ी महंगी है। पर, जेल की काल कोठरियों की ज़िंदगी और भी महंगी है क्योंकि वहां यह स्वतंत्रता संग्राम के मू्ल्य रूप में चुकाई जाती है। ऐ! भारतीय युवक! तू क्यों गफ़लत की नींद में पड़ा बेखबर सो रहा है। उठ! अब अधिक मत सो। सोना हो तो अनंत निद्रा की गोद में जाकर सो रहा।….. धिक्कार है तेरी निर्जीवता पर। तेरे पूर्वज भी नतमस्तक हैं इस नपुंसत्व पर। यदि अब भी तेरे किसी अंग में कुछ हया बाकी हो तो उठकर माता के दूध की लाज रख, उसके उद्धार का बीड़ा उठा, उसके आंसुओं की एक एक बूंद की सौगंध ले, उसका बेड़ा पार कर और मुक्त कंठ से बोल- वंदे मातरम!

प्रताप में भगत सिंह की पत्रकारिता को पर लगे। बलवंत सिंह के नाम से छपे इन लेखों ने धूम मचा दी। शुरुआत में तो स्वयं गणेश शंकर विद्यार्थी को पता नहीं था कि असल में बलवंत सिंह कौन है? और एक दिन जब पता चला तो भगत सिंह को उन्होंने गले से लगा लिया। भगत सिंह अब प्रताप के संपादकीय विभाग में काम कर रहे थे। इन्हीं दिनों दिल्ली में तनाव बढ़ा। दंगे भड़के और विद्यार्थी जी ने भगत सिंह को रिपोर्टिंग के लिए दिल्ली भेजा। विद्यार्थी जी दंगों की निरपेक्ष रिपोर्टिंग चाहते थे। भगत सिंह उनके उम्मीदों पर खरे उतरे। प्रताप में काम करते हुए उन्होंने महान क्रांतिकारी शचिन्द्रनाथ सान्याल की आत्मकथा बंदी जीवन का पंजाबी में अनुवाद किया। इस अनुवाद ने पंजाब में देश भक्ति की एक नई लहर पैदा की। इसके बाद आयरिश क्रांतिकारी डेन ब्रीन की आत्मकथा का अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद किया। प्रताप में यह अनुवाद आयरिश स्वतंत्रता संग्राम शीर्षक से प्रकाशित हुआ। इस अनुवाद ने भी देश में चल रहे आज़ादी के आंदोलन को एक वैचारिक मोड़ दिया।

गणेश शंकर विद्यार्थी के लाडले थे भगत सिंह। उनका लिखा एक एक शब्द विद्यार्थी जी को गर्व से भर देता। ऐसे ही किसी भावुक पल में विद्यार्थी जी ने भगत सिंह को भारत में क्रांतिकारियों के सिरमौर चंद्रशेखर आज़ाद से मिलाया। आज़ादी के दीवाने दो आतिशी क्रांतिकारियों का यह अदभुत मिलन था। भगत सिंह अब क्रांतिकारी गतिविधियों और पत्रकारिता दोनों में शानदार काम कर रहे थे। गतिविधियां बढ़ीं तो पुलिस को भी शंका हुई। खुफिया चौकसी और कड़ी कर दी गई। विद्यार्थी जी ने पुलिस से बचने के लिए भगत सिंह को अलीगढ़ ज़िले के शादीपुर गांव के स्कूल में हेडमास्टर बनाकर भेज दिया। पता नहीं शादीपुर के लोगों को आज इस तथ्य की जानकारी है या नहीं।

भगत सिंह शादीपुर में थे तभी विद्यार्थी जी को उनकी असली पारिवारिक कहानी पता चली। विद्यार्थी जी खुद शादीपुर गए और भगत सिंह को मनाया कि वो अपने घर लौट जाएं। दरअसल भगत सिंह के घर छोड़ने के बाद उनकी दादी की हालत बिगड़ गई थी। दादी को लगता था कि शादी के लिए उनकी ज़िद के चलते ही भगत सिंह ने घर छोड़ा है। इसके लिए वो अपने को कुसूरवार मानती थीं। भगत सिंह को पता लगाने के लिए पिताजी ने अख़बारों में इश्तेहार दिए थे। ये इश्तेहार विद्यार्थी जी ने देखे थे, लेकिन तब उन्हें पता नहीं था कि उनके यहां काम करने वाला बलवंत ही भगत सिंह है। इसी के बाद वे शादीपुर जा पहुंचे थे। भगत सिंह विद्यार्थी जी का अनुरोध कैसे टालते। फौरन घर रवाना हो गए। दादी की सेवा की और कुछ समय बाद पत्रकारिता की पारी शुरू करने के लिए दिल्ली आ गए। दैनिक वीर अर्जुन में नौकरी शुरू कर दी। जल्द ही एक तेज तर्रार रिपोर्टर और विचारोतेजक लेखक के रूप में उनकी ख्याति फैल गई।

इसके अलावा भगत सिंह पंजाबी पत्रिका किरती के लिए भी रिपोर्टिंग और लेखन कर रहे थे। किरती में वे विद्रोही के नाम से लिखते थे। दिल्ली से ही प्रकाशित पत्रिका महारथी में भी वो लगातार लिख रहे थे। विद्यार्थी जी से नियमित संपर्क बना हुआ था। इस कारण प्रताप में भी वो नियमित लेखन कर रहे थे। पंद्रह मार्च 1926 को प्रताप में उनका झन्नाटेदार आलेख प्रकाशित हुआ। एक पंजाबी युवक के नाम से लिखे गए इस आलेख का शीर्षक था- भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन का परिचय और उपशीर्षक था- होली के दिन रक्त के छींटे। इस आलेख की भाषा और भाव देखिए-

“असहयोग आंदोलन पूरे यौवन पर था। पंजाब किसी से पीछे नहीं रहा। पंजाब में सिक्ख भी उठे। ख़ूब ज़ोरों के साथ। अकाली आंदोलन शुरू हुआ। बलिदानों की झड़ी लग गई।”

काकोरी केस के सेनानियों को भगत सिंह ने सलामी देते हुए एक लेख लिखा। विद्रोही के नाम से। इसमें वो लिखते हैं “हम लोग आह भरकर समझ लेते हैं कि हमारा फ़र्ज पूरा हो गया। हमें आग नहीं लगती। हम तड़प नहीं उठते। हम इतने मुर्दा हो गए हैं। आज वे भूख हड़ताल कर रहे हैं। तड़प रहे हैं। हम चुपचाप तमाशा देख रहे हैं। ईश्वर उन्हें बल और शक्ति दे कि वे वीरता से अपने दिन पूरे करें और उन वीरों के बलिदान रंग लाएँ। जनवरी 1928 में लिखा गया यह आलेख किरती में छपा था। इन दो तीन सालों में भगत सिंह ने लिखा और खूब लिखा। अपनी पत्रकारिता के ज़रिए वो लोगों के दिलोदिमाग पर छा गए। फ़रवरी 1928 में उन्होंने कूका विद्रोह पर दो हिस्सों में एक लेख लिखा। यह लेख उन्होंने बी एस संधु के नाम से लिखा था। इसमें भगत सिंह ने ब्यौरा दिया था कि किस तरह छियासठ कूका विद्रोहियों को तोप के मुंह से बांध कर उड़ा दिया गया था।इसके भाग -दो में उनके लेख का शीर्षक था- युग पलटने वाला अग्निकुंड। इसमें वो लिखते हैं- “सभी आंदोलनों का इतिहास बताता है कि आज़ादी के लिए लड़ने वालों का एक अलग ही वर्ग बन जाता है ,जिनमें न दुनिया का मोह होता है और न पाखंडी साधुओं जैसा त्याग। जो सिपाही तो होते थे ,लेकिन भाड़े के लिए लड़ने वाले नहीं, बल्कि अपने फ़र्ज़ के लिए निष्काम भाव से लड़ते मरते थे। सिख इतिहास यही कुछ था। मराठों का आंदोलन भी यही बताता है। राणा प्रताप के साथी राजपूत भी ऐसे ही योद्धा थे और बुंदेलखंड के वीर छत्रसाल और उनके साथी भी इसी मिट्टी और मन से बने थे “। यह थी भगत सिंह की पढ़ाई। बिना संचार साधनों के देश के हर इलाक़े का इतिहास भगतसिंह को कहां से मिलता था -कौन जानता है।

मार्च से अक्टूबर 1928 तक किरती में ही उन्होंने एक धारावाहिक श्रृंखला लिखी। शीर्षक था आज़ादी की भेंट शहादतें। इसमें भगत सिंह ने बलिदानी क्रांतिकारियों की गाथाएं लिखीं थी। इनमें एक लेख मदनलाल धींगरा पर भी था। इसमें भगतसिंह के शब्दों का कमाल देखिए -“फांसी के तख़्ते पर खड़े मदन से पूछा जाता है -कुछ कहना चाहते हो? उत्तर मिलता है वन्दे मातरम! मां! भारत मां तुम्हें नमस्कार और वह वीर फांसी पर लटक गया। उसकी लाश जेल में ही दफ़ना दी गई। हम हिन्दुस्तानियों को दाह क्रिया तक नहीं करने दी गई। धन्य था वो वीर। धन्य है उसकी याद। मुर्दा देश के इस अनमोल हीरे को बार बार प्रणाम।

भगतसिंह की पत्रकारिता का यह स्वर्णकाल था। उनके लेख और रिपोर्ताज़ हिन्दुस्तान भर में उनकी कलम का डंका बजा रहे थे। वो जेल भी गए तो वहां से उन्होंने लेखों की झड़ी लगा दी। लाहौर के साप्ताहिक वन्देमातरम में उनका एक लेख पंजाब का पहला उभार प्रकाशित हुआ। यह जेल में ही लिखा गया था। यह उर्दू में लिखा गया था। इसी तरह किरती में तीन लेखों की लेखमाला अराजकतावाद प्रकाशित हुई। इस लेखमाला ने देश के व्यवस्था चिंतकों के सोच पर हमला बोला। उनीस सौ अट्ठाइस में तो भगत सिंह की कलम का जादू लोगों के सर चढ़ कर बोला। ज़रा उनके लेखों के शीर्षक देखिए- धर्म और हमारा स्वतंत्रता संग्राम, साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज, सत्याग्रह और हड़तालें, विद्यार्थी और राजनीति, मैं नास्तिक क्यों हूं, नए नेताओं के अलग अलग विचार और अछूत का सवाल जैसे रिपोर्ताज़ आज भी प्रासंगिक हैं।इन दिनों दलितों की समस्याएं और धर्मांतरण के मुद्दे देश में गरमाए हुए हैं, लेकिन देखिए भगत सिंह ने 87 साल पहले इस मसले पर क्या लिखा था -” जब तुम उन्हें इस तरह पशुओं से भी गया बीता समझोगे तो वो ज़रूर ही दूसरे धर्मों में शामिल हो जाएंगे। उन धर्मों में उन्हें अधिक अधिकार मिलेंगे, उनसे इंसानों जैसा व्यवहार किया जाएगा फिर यह कहना कि देखो जी ईसाई और मुसलमान हिन्दू क़ौम को नुकसान पहुंचा रहे हैं, व्यर्थ होगा। कितनी सटीक टिप्पणी है? एकदम तिलमिला देती है।

इसी तरह एक और टिप्पणी देखिए -” जब अछूतों ने देखा कि उनकी वजह से इनमें फसाद हो रहे हैं। हर कोई उन्हें अपनी खुराक समझ रहा है तो वे अलग और संगठित ही क्यों न हो जाएं? हम मानते हैं कि उनके अपने जन प्रतिनिधि हों। वे अपने लिए अधिक अधिकार मांगें। उठो! अछूत भाइयो उठो! अपना इतिहास देखो। गुरु गोबिंद सिंह की असली ताक़त तुम्ही थे। शिवाजी तुम्हारे भरोसे ही कुछ कर सके। तुम्हारी क़ुर्बानियां स्वर्ण अक्षरों में लिखीं हुईं हैं। संगठित हो जाओ। स्वयं कोशिश किए बिना कुछ भी न मिलेगा। तुम दूसरों की खुराक न बनो। सोए हुए शेरो! उठो और बग़ावत खड़ी कर दो।

इस तरह लिखने का साहस भगत सिंह ही कर सकते थे। बर्तानवी शासकों ने चांद के जिस ऐतिहासिक फांसी अंक पर पाबंदी लगाईं थी, उसमें भी भगतसिंह ने अनेक आलेख लिखे थे। इस अंक को भारतीय पत्रकारिता की गीता माना जाता है।

और अंत में उस पर्चे का ज़िक्र, जिसने गोरों की चूलें हिला दी थीं। आठ अप्रैल, 1929 को असेम्बली में बम के साथ जो परचा फेंका गया, वो भगत सिंह ने लिखा था। यह परचा कहता है -बहरों को सुनाने के लिए बहुत ऊंची आवाज़ की आवश्यकता होती है। …जनता के प्रतिनिधियों से हमारा आग्रह है कि वे इस पार्लियमेंट का पाखंड छोड़ कर अपने अपने निर्वाचन क्षेत्रों में लौट जाएं और जनता को विदेशी दमन और शोषण के खिलाफ क्रांति के लिए तैयार करें। ..हम अपने विश्वास को दोहराना चाहते हैं कि व्यक्तियों की हत्या करना सरल है, लेकिन विचारों की हत्या नहीं की जा सकती।
इंक़लाब! ज़िंदाबाद!


Wednesday, 2 September 2015

Indian Workers On Strike

Britishers left India but part of their draconian law still remains prevalent in our country. Still after Independence we the people & our rights remains on stake, remains exploited. Such an example are exploited citizens are workers of this country.
Present Government of India is carrying legacy of suppressing the weaker section, the working class people. Crushing of labour rights has happened. Important Conventions of international Labour Organization (ILO) were distorted. For Example-

Convention 87- Freedom of Association & Protection of Right to Organized Convention.

Convention 98- Right to Organize & Collective Bargaining Convention.

Witnessing all these violations of labour laws with implementation of anti-people policies, Central Trade Unions (CTU's) decided to agitate & protest against Government's policies. 2nd September 2015, marks historic All India Strike by Proletariat class.

Inquilab Zindabad
Long Live Proletariat!

Saturday, 29 August 2015

The Fear of British Rulers

Bhagat Singh's name in real sense became symbol of Indian revolutionary movement like Lenin of Russian revolution. Britishers acknowledged his political inclination & perspective which became a stiff reason to hang him without a fair trail & justice.

According to Jatindra Nath Sanyal, a co-accused in Lahore Conspiracy Case & who knew him very well wrote:
Bhagat  Singh was an extremely well read man & his special sphere of study was Socialism. The batch of young men that figured in Lahore Conspiracy Case was essentially an intellectual one. But even in this group Bhagat Singh predominanted for his intellectual ascendancy. Though Socialism was his special subject, he had deeply studied the history of Russian revolutionary movement from its beginning in the early 19th century to the October Revolution of 1917. It is generally believed that very few in India could be compared to him in the knowledge of this special subject. The economic experiment in Russia under the Bolshevik regime also greatly interested him.

Here is photo of Bhagat Singh's death certificate. He was hanged in hurry by britishers, a day earlier his scheduled day in evening, 7 p.m, which was against protocol of hanging procedure.

Inquilab Zindabad!

Tuesday, 25 August 2015

Assessment by Prof. Chaman Lal

It would be unfair to take one name when it comes on detailing Bhagat Singh & his revolutionary life, he is none other than Dr. Chaman Lal. An authority in this country who rightly pointed out Bhagat Singh's political interest, activities of his revolutionary career. Many hidden facts related to Bhagat Singh & his comrades are being highlighted by Dr. Chaman Lal.

His books like
Understanding Bhagat Singh
Bhagat Singh's Jail Notebook
Bhagat Singh aur unke saathiyoon k dastawez, are real eye opener for all of us.
One such example is this piece of interview of Dr. Chaman Lal, its a landmark assessment of Bhagat Singh in recent time.

Long Live Revolution!

Monday, 24 August 2015

A Disgrace to Nation- Untouchability

The problem of Untouchability (1928)- "Bhagat Singh made a scathing attack on the philosophy (karmvipak) of Hinduism, which provides a rationale to a most heinous system of untouchability and caste hierarchy and links the fight against untouchability to revolutionary politics, which shows a concrete understanding of the linkages of religion with caste system in India. He criticised the orthodox social elements as well as the leaders like M. M. Malviya getting publicly garlanded by a scavenger and then purifying himself by taking bath with the clothes. He invokes the principle of equality and demands to abolish the ideas and of discrimination based on birth or social division of labour. He criticises the hierarchical system that treats inhumanly the very sections that render the most essential, most basic services to the society. Finally, he suggests that unless the untouchables – the backbone of this country – organise themselves, the problem of untouchability will find no solution."
In recent times our nation had witnessed frequent occurrence of atrocities on low caste people, minorities, Dalits, etc. For example-
The National Human Rights Commission (NHRC) has issued notice to the Gujarat government over the issue of a separate Anganwadi for the Dalit children in Hajipur village of Patan district. The Commission has taken suo motu cognizance of a media report that there are two separate Anganwadis, one for the children of Dalits and the other for the children of other castes, in Gujarat's Hajipur village.
The report stated that a three-year-old Dalit girl, who was lost in conversation with her four-year-old neighbour friend, walked towards Anganwadi no. 160 but was stopped at the gate and asked to go to Anganwadi no. 159 that was meant for Dalits. Anganwadi no. 160 is meant for the children of Patidars and Brahmins.
Few months ago, present NDA government passed SC/ST Prevention of Atrocities Bill (POA) in lower house but question is will it make a difference? Best provision under this law is filing of a case by Dalit but also a big flaw lies which states that under this law only Hindu, Sikh & Buddhist Dalits are considered as Dalits & not Muslim or Christian Dalits. Its a serious flaw underlining discrimination.
Indian Judiciary in a caste oriented Country has chosen to treat atrocities rooted in caste like a "normal crime". All said & done, law alone do not deter atrocities; convictions do.
It can be concluded that three sided action is needed, One by the Dalit community, they need to educate, organize & agitate themselves for their own right & Secondly all four pillars of Indian democracy must come ahead with loyalty to rescue this section of suffering Indians & thirdly we the part of society should understand that humanity stands ahead than any caste or religion.
Inquilab Zindabad
Saamrajyavaad Murdabad

Sunday, 23 August 2015

India's Unity under threat

Communal Riots and the Solution-
Bhagat Singh said, “To stop people fighting with one another, it is essential to develop class consciousness” and he advocates people’s unity transcending the divisions of religion, colour, community, nationality etc., to unite to break the shackles of colonialism and attain economic independence. He cites the example of Soviet Russia and also an incidence from Calcutta where in a riot-charged atmosphere the industrial workers of both Hindu and Muslim communities joined hands to resist the riot as examples of class-consciousness overcoming the social divides. He also expresses hope in the young generation, which was then showing a growing despise towards communal riots.

Undivided India witnessed rise of Islamic & Hindu fundamentalists which resulted in riots. A look on riots in pre- Independent India:
11 riots-1923
18 riots- 1924
16 riots- 1925
35 riots- 1926.
Taking up communal violence issue of present India, any government formed at centre or in state driven by certain set of ideologies are being tagged as failure to stop continuity of communal clashes. Presently India's social & secular fabric is under threat.

Bhagat Singh's dream of united India with communal harmony needs proper check without undergoing political headlocks.

Can India's dream to be a Superpower be fulfilled just on development neglecting its domestic issues like Communalism?

Wednesday, 19 August 2015

Uncertain Glory of India

Bhagat Singh did not dreamed of India which would be wrecked by hunger, malnutrition, communalism overall unequal status of Indian citizens.

This statistics of hunger people would surely had saddened Bhagat Singh but we as nation need to stand against these stigmatized conditions of our countrymen.

Wednesday, 12 August 2015

Bhagat Singh & Inquilab Zindabad

Bhagat Singh is one of the revolutionaries from galaxy of India's freedom struggle who gave a new rejuvenating slogan of Long Live Revolution, Inquilab Zindabad because till then India's slogan for freedom was Vande Matram. Not only giving a slogan but also defined it with its core meaning.

Long Live Revolution- It represented the outlook; the revolutionary movement will not stop at the achievement of freedom; it will continue till the system which permits the exploitation of man by man or a nation by another nation is abolished and a basic change in socio-economic structure of society is brought about.

Long Live Proletariat – It means this belongs to the toiling mass of working class & proletariat the driving force of the revolution- a slogan that is being sought to be dropped today by the betrayers of Socialism. What is unfortunate is that some of our old revolutionaries who profess by Socialism have also fallen prey to this trend and emphasize the 1st & 3rd slogan bypassing the 2nd.

Down with Imperialism- he defines it by saying “A slave nation cannot establish a classless society, abolishing exploitation and bring about equality amongst the men. For such a nation first and foremost task is to break the chains of Imperialist domination that binds it.In other words revolution in a slave country has to be Anti-Imperialistic and Anti-Colonial.”.

An important point to be noted is Bhagat Singh was opposed to whole system of Imperialistic rule & not only against British imperialism, so his slogan was Down with Imperialism.

A Step towards Egalitarian India

MNREGA in reality is the only scheme in history of India which has empowered women but present Government of India had undermined its efficiency.

Women of rural India have now a better position than earlier in terms of monetary in dependency. Independent decision making by women has taken place real terms. MNREGA has strengthened the women community.

Just keeping MNREGA on discriminatory political base will not be a fair deal. Mr. Narendra Modi openly had tagged it as a failed scheme of UPA-1 government but analysis of MNREGA should overcome opportunistic political criticism.

Perceptional Stance of Shahid Bhagat Singh

The perception with which Bhagat Singh ended his life is something very reasonable, valid & relevant. A transition from Anti-colonial to Socialism is traceable.
The ideas of Bhagat Singh, even if not wholly but substantially have been incorporated as pre-ambular vision of our Constitution. But the dream for which he sacrificed his life has not been fulfilled and the relevance of what he said can hardly be ignored. The ground realities, if at all, changed only marginally”, says Supreme Court of India.

The move by present Government of India to omit out words Socialist/Secular from our Constitution raises suspicion to overrule the idea of Independent India what Shahid Bhagat Singh thought of.

Russian revolution inspired Bhagat Singh to the core, so he had great regards for Lenin. The turning point came in 1928, September 8-9, Delhi, Ferozshah Kotla, Hindustan Republican Association (HRA) got transformed into Hindustan Socialist Republican Association (HSRA). Word Socialist was added to its name & Socialism became their ultimate goal to be achieved.

Here is an image of the leaflet which was thrown by Bhagat Singh & Buttakeshwar Dutt along with harmless bombs in assembly hall on 8th April, 1929.

Tuesday, 11 August 2015

Authentic Photos

Since many years in this country there has been series of efforts to misappropriate, misinterpret, dismantle the real picture of Bhagat Singh as a contributor to India's freedom. As Revolutionary he is the most unique person to be explored for personal interest.

But interestingly in all his lifetime he had only four original photographs at different age. They are as follows-

1. 1st picture at age 12 after Jallianwalah Bagh massacre.
2. 2nd picture after age 21+
3. 3rd picture at age of 17
4. 4th picture at age of 20 after his first arrest.
On internet one can find Bhagat Singh wearing yellow turbon but in reality he only wore white turbon. Coloring his turbon is forceful imposition of  right fringe commumal elements.

Long Live Revolution
Inquilab Zindabad!

Important Letters

In 1922, when M.K.Gandhi took back non cooperation movement it resulted in rise of many dissent youth voice like B.C.Vohra, Sukhdev, Chandrasekhar Azad & Bhagat Singh. From here Mr. Gandhi's non- violence got competed against revolutionary activities of HRA & later HSRA.

Till hanging of Bhagat Singh, Sukhdev & Rajguru, M.K.Gandhi did not confront Bhagat Singh in any manner. Neither face-off nor any polemic criticism but Sukhdev took an opportunity to critisize Gandhi & wrote a letter to him. In return to this Mr. Gandhi wrote a letter to Sukhdev which he published in his paper Harijan.

Here are two images of letters. First is of Gandhi's reply to Sukhdev & Second is Bhagat Singh's letter to his father.

Monday, 10 August 2015

An Important Recalling

A book edited by Professor Chaman Lal, an authority on Bhagat Singh's life & his activities as a revolutionary.

Jail notebook of Bhagat Singh is an asset related to Bhagat Singh emphasizing his idea related to Independence of India. This book is one of the most interesting book covering his all over persona.

Second image is a special message which HSRA leaders had send to Soviet Union on Lenin's death anniversary, 21st January.

Saturday, 8 August 2015

Asset of India lies in it's rural area.

https://ruralindiaonline.org/articles/debating-rice-in-the-forest-of-learning/

Glimpse of Intellectuality

Bhagat Singh is only remembered as a fighter revolutionary carrying a gun with him all the time but this is a wrong notion being set as thinking among us. A highlight on his intellectual efforts.

As per Shiv Verma, close associate of Bhagat Singh from U.P, his thirst for reading books was something unique. As estimated..

He read 50 books during his Schooltime;
200 books before his 1st arrest in 1921
Approximately 300 books during imprisonment of 716 days from 8th April, 1929- 23rd March 1931.
Merely at age of 23 years,5months, 25days, a persons reading voraciously is unimaginable. But this was done in reality.

According to his nephew, Prof. Jagmohan Singh, Bhagat Singh established a library of 175 books by around 70 authors at Agra where Assembly bomb attack was planned. Even on 23rd March, on the day he was hanged, he was reading V.I.Lenin's "State and Revolution".

The Intellectual side of Indian Revolution has always remained weak but to overcome this at present we need to think & work beyond conventional concepts of our own subjects in which master. Being a specialist we have to act like a generalist.

Inquilab Zindabad.

Love towards Reading books.

http://www.shahidbhagatsingh.org/index.asp?link=letter_jaidev

Stand against Religious Fundamentalism, a big challenge to Secular values.

http://scroll.in/article/747035/bangladesh-bloggers-murder-fighting-for-free-expression-in-an-age-of-death-squads

Admiration for Bhagat Singh

During 1930's it was said that "If MK Gandhi was Sun of India's political sky, Bhagat Singh was a star which rose out from depth of darkness."

After death his article named Why I am an athiest? became relevant enough to be considered very important. At the same time renowned rationalist leader E.V.Ramasamy Periyar from Tamil Nadu published this article  in Tamil & presented his views on comparing Gandhi & Bhagat Singh. Clarity in idea of Bhagat Singh' perception & action was important then & is equally relevant in today's contemporary India. Such an admiration for Bhagat Singh proves his intensity.

Friday, 7 August 2015

A Humble Hearty Request

Mother of Bhagat Singh, Smt. Vidyawati Ji's appeal to youth section of our society proves one thing very clear, that India either colonial or independent, needs involvement of its youth force in decision making and being integral part of Socio-Political sphere. If politics decides our life pattern with roller coaster rides, we must choose our politics.
Bhagat Singh stood to build up Society on Socialistic base with universal brotherhood, equality for all rejecting exploitation of man by man and country by country. Since many years this truth is on track to be misappropriated by extream right Hindu fringe elements like Bhagat Singh Kranti Sena.
The question is not to own Bhagat Singh on one's own side but to face truth for what purpose Bhagat Singh gave up his life.
Was it for a Hindu Nation or an Islamic state or for an Egalitarian India?

Set of books from Expertized intellectual of this country.

Each & Every book highlights every aspect of revolutionary life of Bhagat Singh. By reading these books idea of Bhagat Singh for Independent India will be known.